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तो यहां से ऐसे रखी गई थी अयोध्या विवाद की नींव, पढ़ें पूरी दास्तां

अयोध्या

6 दिसंबर, 1992 उत्तर प्रदेश के अयोध्या में आज के दिन एक ऐसे विवाद का जन्म हुआ जिसने बीते 25 वर्षों तक देश की न सिर्फ सियासत को गर्माए रखा बल्कि दो समुदायों में धर्म- जाति की ऐसी खाई खोदी जो आज तक भर ही नहीं पाई है। जी हां.. बाबरी विध्वंस को आज 26 साल पूरे हो गए हैं। इन 26 सालों में देश में मंदिर और मस्जिद के नाम पर अनेकों दंगे हुए, सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन इस विध्वंसकारी विवाद की जड़ा सिर्फ 1992 से ही नहीं रखी बल्कि इसका विवाद तो 1528 से ही शुरु  हो गया था।

कहा जाता है कि 1528 अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे कुछ हिंदू अपने आराध्य देवता राम का जन्म स्थान मानते हैं। समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था। जानकारों का मानना है कि इस विवाद का सबस पहले 1853 हुआ था। 1853 में इस जगह के आसपास पहली बार दंगे हुए थे।

हिन्दू-मुस्लिम के इस वावद को सुलझाने के लिए तत्कालीन अंग्रेज़ शासकों ने 1859 में विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी।

लेकिन 23 दिसंबर 1949 में असली विवाद शुरु हुआ। मस्जिद के अंदर राम की मूर्तियां मिलने पर हिंदुओं में मंदिर बनाने की इच्छा प्रबल हुई। हिंदुओं का कहना था कि भगवान राम वहां प्रकट हुए है। जबकि मुस्लिमों का कहना था कि चुपके से मूर्ति वहां रख दी गई। तब तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू ने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीबी पंत से इस मामले में फौरन कार्रवाई करने को कहा। लेकिन जिला मजिस्ट्रेट केके नायर ने हिंदुओं की भावनाओं को भड़कने और दंगे फैलने के डर से राम की मूर्तियां हटाने से मना कर दिया। जिसके बाद इसे विवादित ढांचा मानकर ताला लगवा दिया गया। 16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद नामक शख्स ने फैजाबाद के सिविल जज के सामने अर्जी दाखिल कर यहां पूजा की इजाजत मांगी। जिसे जज एनएन चंदा ने इजाजत दे दी।

इसके बाद मुसलमानों ने इस फैसले के खिलाफ अर्जी दायर की। विवादित ढांचे की जगह मंदिर बनाने के लिए 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने एक कमिटी गठित की। लेकिन 1 फरवरी 1986 को यूसी पांडे की याचिका पर फैजाबाद के जिला जज केएम पांडे ने पूजा करने की इजाजत देते हुए विवादित ढांचे से ताला हटाने का आदेश दिया। जिसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया गया। 6 दिसंबर 1992 को बीजेपी, वीएचपी और शिवसेना समेत दूसरे हिंदू संगठनों के लाखों कार्यकर्ताओं ने विवादित ढांचे को गिरा दिया। जिसके बाद पूरे देश में दंगे भड़क गए जिसमें करीब 2 हजार लोगों की जानें गई।

1998 प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने गठबंधन सरकार बनाई। 2001 बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर तनाव बढ़ गया और विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण करने के अपना संकल्प दोहराया। हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढाँचा गिरा दिया थाजनवरी, 2002 अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अयोध्या समिति का गठन किया। वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुसलमान नेताओं के साथ बातचीत के लिए नियुक्त किया गया।

2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय सुनाया जिसमें विवादित भूमि को रामजन्मभूमि घोषित किया गया। कोर्ट ने बहुमत से निर्णय दिया कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता है उसे हिंदू गुटो को दे दिया जाए। इसके साथ ही यह भी कोर्ट ने आदेश दिया की रामलला की प्रतिमा वहां से नहीं हटाया जाएगा।

इसके साथ ही सीता रसोई और राम चबूतरा आदि के कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा। दो न्यायधीधों ने यह निर्णय भी दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए। कोर्ट के इस फैसले को हिंदू और मुस्लिम पक्ष मानने से इंकार कर दिया और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

और तभी से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में विचारधीन है। हालांकि 2018 की एक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने आदेस सुनाते हुए कहा है इस विवाद को सिर्फ एक जमीन विवाद से जुड़े होने पर सुनवाई होगी न की किसी धर्म विशेष के आधार पर। फिलहाल इस केस की अगली सुनवाई 2019 के जनवरी माह में होना तय है। लेकिन कुछ हिन्दू संगठनों का कहना है कि केन्द्र में और राज्य में भाजपा की पूर्ण बहुमत सरकार है लिहाज़ा सराकर को अब एक अध्यादेश लाकर इस विवाद को खत्म कर दिया जाए और विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर का निर्माण किया जाए।