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फिल्म रिव्यु -आख़िरकार रिलीज़ हुई पीएम मोदी की बायोपिक ,कुछ खास छाप नहीं छोड़ पायी

23 मई को एक शानदार जीत के साथ बीजेपी ने अपना विजयी परचम लहराया और आज 24 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक PM Narendra Modi सिनेमा घरों में आ चुकी है। एक ऐतिहासिक जीत के बाद  ये तो पता चल गया कि हमारे प्रधानमंत्री के साथ आज पूरा देश खड़ा है लेकिन उनकी बायोपिक को इतने अच्छे review नहीं मिल पाए हैं। बता दे की ये मूवी 11 अप्रैल को रिलीज़ होनी थी  लेकिन चुनावी मैदान गरम होने के कारण और विपक्षी पार्टयों के विरोध के कारण ये पिक्चर आज 24 मई को रिलीज़ हुई है।

कहानी : इस फिल्म की शुरुआत 2013 की उस बैठक से होती हैं जहाँ पर नरेंद्र मोदी को 2014  के चुनाव में उमीदवार घोषित किया जाता है और फिर ये फिल्म फ्लैशबैक में चलती हैं , जब हमारे प्रधानमंत्री रेलवे में चाय बेचते थे और उनकी माँ लोगो के घरों में बर्तन मांजती थी।  ये फिल्म अंत होती हैं 2014 के चुनाव की जीत के साथ।

 ये फिल्म केवल 2 महीनो में बनायी गयी हैं और स्क्रीन पर ये साफ़-साफ़ दिख रहा हैं , ये फिल्म 1950 से 2014 तक का समय तय करती हैं और 2 महीनों में इतने लम्बे समय की फिल्म बनना और उसके साथ न्याय हो पाना नामुमकिन है।  ये फिल्म दावा करती हैं कि वो नरेंद्र मोदी के जीवन के हर पहलु से आपको रूबरू करवाएगी लेकिन ये फिल्म हमें कहीं न कहीं इस बात पर निराश कर देती हैं। फिल्म का फर्स्ट हाफ आपको बहुत ही बोरिंग लग सकती है लेकिन पिक्चर का सेकंड हाफ आपको कहानी के साथ बांधे रखता है।  बहुतों से तथ्यों को पेश नहीं किया गया है और विपक्षी पार्टियों की सिर्फ एकतरफ़ा छवि दिखाई गयी है। अगर फिल्म के एक्टर और गानों की बात की जाए तो उन्होंने अपना काम बहुत ही उम्दा तरीके से किया है। फिल्म के डायलॉग जबरदस्त हैं जैसे की – जीतने का मज़ा तब आता है, जब सब आपके हारने की उम्मीद करते हैं ! और हिमालय पर की गयी शूटिंग की सिनेमोटोग्राफी बेहतरीन हैं।

महज़ सवा घंटे में नरेंद्र मोदी की कहानी को दिखाने की कोशिश की गयी है।  ये फिल्म उमंग कुमार द्वारा बनायी गयी है जो की सरबजीत और मैरीकॉम जैसी फिल्म के निर्माता हैं.

Ratings-2/5

Bollywood Desk

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