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क्या है लखनऊ गेस्ट हाउस कांड? जिसमें बाल-बाल बची थीं बसपा सुप्रीमो मायावती

दरअसल, सत्ता से बेदखल हो जाने के बाद भड़के गुस्से की कहानी ही है सपा और बसपा के बीच हुआ गेस्ट हाउंस कांड. एक ऐसा गुस्सा जिसे समाजवादी पार्टी, मायावती और बसपा द्वारा किया गया विश्वासघात मानती थी. बस वही, गुस्सा और सपा की झल्लाहट ही थी 2 जून 1995 को लखनऊ घटी वो घटना जिसे गेस्ट हाउस कांड कहा जाता है. चलिए शुरु करते हैं वो कहानी जिसने इतने सालों तक सपा-बसपा को साथ नहीं आने दिया.

कैसे शुरु हुआ विवाद?

1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बीजेपी को रोकने के इरादे से यूपी में सपा और बसपा साथ आ गए. 1993 में यूपी में चुनाव हुए और सपा-बसपा ने अपनी पहली साझा सरकार बनाई और मुख्यमंत्री मुलायम सिंह बने.

लेकिन सपा-बसपा की ये दोस्ती ज्यादा समय नहीं चली, और बाद में मायावती की भाजपा के साथ तालमेल की ख़बरें आईं जिसका ख़ुलासा आगे चलकर हुआ. कुछ ही वक़्त बाद मायावती ने अपना फैसला सपा को सुना दिया. और शुरु हुआ समाजवादी पार्टी का बुरा वक्त. दोनों पार्टियों के बीच इन दूरियों को खाई में तब्दील करने के काम हुआ 1995 की गर्मियों के मौसम में. इसमें मुख्य किरदार गेस्ट हाउस है. उस दिन जो घटा उसकी वजह से बसपा ने सरकार से हाथ खींच लिए और वो अल्पमत में आ गई.

अंततः वो दिन भी आ ही गया जिसने न केवल भारतीय राजनीति का बदरंग चेहरा दिखाया बल्कि मायावती और मुलायम के बीच वो खाई बनाई जिसे लंबा अरसा भी नहीं भर सका.

गेस्ट हाउस कांड

तारीख थी 2 जून, 1995 . बीएसपी ने एक दिन पहले ही मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में बनी सपा-बसपा सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. और मायावती राज्य की अगली मुख्यमंत्री बनने की तैयारी कर रही थीं. इस समय तक उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा से मिलकर मायावती बीजेपी, कांग्रेस और जनता दल के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश कर चुकी थीं.

2 जून 1955 की शाम का वक्त हो चला था. मुलायम सरकार का तख्तापलट करने की फुल प्रूफ योजना के साथ मायावती वीआईपी गेस्ट हाउस में अपने नेताओं के साथ बैठक कर रही थीं. वहीं दूसरी तरफ कांशीराम और मायावती की इस चाल से मुलायम सिंह का गुस्सा फूट पड़ा, वे किसी भी सूरत में सरकार जाने नहीं देना चाहते थे. उधर बैठक खत्म होने के बाद कुछ विधायकों के साथ मायावती अपने रुम में चली गईं. बाकी विधायक कॉमन हॉल में ही बैठे थे. शाम के करीब चार से पांच के बीच का वक्त रहा होगा. इसी वक्त करीब दो सौ समाजवादी पार्टी के विधायकों और कार्यकर्ताओं के उत्तेजित हुजूम ने वीआईपी गेस्ट हाउस पर धावा बोल दिया.

NewsLaundry वेबसाइट के मुताबिक, सपा नेताओं ने गेस्ट हाउस पर धावा बोलने के बाद वहां मौजूद बीएसपी विधायकों की पिटाई शुरु कर दी. इस दौरान उन्मादी भीड़ ने कई बसपा नेताओं को लहू लुहान कर दिया. इतना ही नहीं सपा कार्यकर्ता और नेता चिल्ला रहे थे, गाली दे रहे थे, जातीसूचक शब्दों का प्रयोग कर रहे थे. इसके अलावा बीएसपी विधायकों और उनके परिवारों को घायल करने या जान से मारने की खुल्लम-खुल्ला धमकियां दी जा रही थीं.

मायावती पर हमला

इस दौरान मारपीट में, कुछ विधायक दौड़ते हुए मायावती के रुम में आए और नीचे चल रहे उत्पात की जानकारी दी. जिसके बाद मायावती और कुछ नेता कमरे में बंद हो गए और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. लेकिन तभी समाजवादी पार्टी के उत्पाती दस्ते का एक झुंड धड़धड़ाता हुआ गलियारे में घुसा और मायावती के कमरे का दरवाजा पीटने लगा.

घटना की जानकारी मिलने के बाद केन्द्र सरकार, राज्यपाल और बीजेपी के नेता सक्रिय हो चुके थे. इसका ही असर था कि भारी तादाद में पुलिस बल वहां मौके पर पहुंच गया. और डीएम ने मोर्चा संभाला और मायावती के खिलाफ नारे लगा रही और गालियां दे रही भीड़ को वहां से बाहर किया. पुलिस ने समाजवादी पार्टी के विधायकों पर लाठीचार्ज किया तब जाकर वहां स्थिति नियंत्रण में आ सकी. और तब जाकर कई घंटों बाद मायावती के कमरे का दरवाजा खुला और वह वहां से बाहर आईं. इसके अगले ही दिन यानी 3 जून मायावती ने सीएम पद की शपथ ग्रहण कर अपने विरोधियों को जवाब दे दिया. 

भले ही इस घटना को अब करीब 23 साल हो चुके हैं, लेकिन उस खौफनाक दिन को बसपा सुप्रीमो मायावती और वहा मौजूद नेता कभी नहीं भूल सकते. क्योंकि अगर पुलिस प्रशासन मौके पर नहीं आता तो हालात इससे भी बुरे हो सकते थे. यहां तक मायावती की जान पर तक बन सकती थी. इस बात खुद मायावती ने कई बार कहा है कि उस दिन मेरी हत्या की साजिश की गई थी. 

हालांकि इस घटना के बाद अब एक बार फिर सपा और बसपा एक साथ आ रहे हैं. और कारण भी वहा पुराना वाला है यानी बीजेपी को रोकना. आखिरी में इतना ही कि राजनीति में सब जायज है जो कल दुश्मन थे वे आज दोस्त भी हो सकते हैं.

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