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शिक्षक दिवस: डॉ. राधाकृष्णन की कुछ ऐसी बातें, जो शायद आप नहीं जानते होंगे

आप लोग ये तो जानते ही हैं कि डॉ. राधाकृष्णन एक महान दार्शनिक, शिक्षाविद और लेखक थे। वो जीवनभर अपने आपको शिक्षक मानते रहे। उन्होंने अपना जन्मदिवस शिक्षकों के लिए समर्पित किया। इसलिए 5 सितंबर सारे भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। आइए ऐसी कुछ और बातें आपको बतातें हैं डॉ. राधाकृष्णन के बारे में…

बात उस जमाने की है जब कम उम्र में शादियाँ होती थी। 1903 में 16 वर्ष की कम आयु में ही उनका विवाह ‘सिवाकामू’ से हो गया। उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी। उनको तेलुगु भाषा का अच्छा ज्ञान था। वह अंग्रेजी भाषा भी जानती थी। 1908 में राधाकृष्णन दम्पति को एक पुत्री का जन्म हुआ।

1947 में अपने ज्ञान और प्रतिभा के कारण डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। उनको अनेक विश्वविद्दालय का चेयरमैन बनाया गया।

सन् 1952 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बनाए गए। इस महान दार्शनिक शिक्षाविद और लेखक को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया। 13 मई, 1962 को डॉ. राधाकृष्णन भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बने। सन् 1967 तक राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने देश की अमूल्य सेवा की।

कहा जाता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु 14 -15 अगस्त की रात्रि 12 बजे आजादी की घोषणा करने वाले थे पर इसकी जानकरी सिर्फ राधाकृष्णन को थी। वो एक गैर परम्परावादी राजनयिक थे।
ऐसी मीटिंग जो देर रात तक चलती थी उसमें डॉ॰ राधाकृष्णन रात 10 बजे तक ही हिस्सा लेते थे, क्यूंकि उनके सोने का वक्त हो जाता था।

सन् 1949 से सन् 1952 तक डॉ. राधाकृष्णन रूस की राजधानी मास्को में भारत के राजदूत रहे। भारत रूस की मित्रता बढ़ाने में उनका अधिक योगदान रहा था।

डॉ. राधाकृष्णन भारतीय दर्शन शास्त्र परिषद्‍ के अध्यक्ष भी रहे। कई भारतीय विश्वविद्यालयों की भांति कोलंबो एवं लंदन विश्वविद्यालय ने भी अपनी-अपनी मानद उपाधियों से उन्हें सम्मानित किया।